अपनों से ही खौफ में बेटी: चाचा की दबंगई से टूटा परिवार, जमीन हड़पने और जान से मारने की धमकी से दहला सूरजपुर

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सुरजपुर/प्रतापपुर 
जनपद पंचायत प्रतापपुर के ग्राम बड़वार बरगीडीह से रिश्तों को शर्मसार कर देने वाला सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां एक भतीजी ने अपने ही सगे चाचा पर जमीन कब्जाने, मारपीट करने, धमकी देने और लगातार प्रताड़ित करने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। हालात इतने भयावह हो गए कि पीड़िता को अपनी सुरक्षा और न्याय की गुहार लेकर जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सूरजपुर के दरबार तक पहुंचना पड़ा।
पीड़िता जसमुन निशा, पिता मोहम्मद इनुस, निवासी ग्राम बड़वार बरगीडीह, ने प्रशासन को सौंपे लिखित आवेदन में आरोप लगाया है कि उसके चाचा इन्त मोहम्मद, पिता स्वर्गीय जाफर अली, लगातार उनके हिस्से की जमीन पर अवैध कब्जा कर रहे हैं। आरोप है कि आरोपी सुनियोजित तरीके से कभी जमीन का एक टुकड़ा तो कभी दूसरा हिस्सा जबरन अपने कब्जे में ले लेता है और परिवार को डराकर चुप कराने की कोशिश करता है।

थाने से मिली फटकार, अब कलेक्टर-एसपी से इंसाफ की गुहार…बोली पीड़िता—‘क्या बेटियों की सुनवाई सिर्फ नारों तक सीमित है?

पीड़िता के मुताबिक, जब परिवार ने अपने हिस्से की जमीन पर मकान निर्माण शुरू कराया, तो आरोपी रात के अंधेरे में पहुंचकर निर्माणाधीन दीवार तक गिरा देता था। विरोध करने पर लाठी-डंडे लेकर हमला करने दौड़ता, गंदी गालियां देता और पूरे परिवार को जान से खत्म करने की धमकी देता था।
इतना ही नहीं, आवेदन में पीड़िता ने मारपीट की घटनाओं का भी जिक्र किया है। लगातार हो रही प्रताड़ना से परेशान परिवार कई बार थाने पहुंचा, लेकिन वहां भी उन्हें न्याय नहीं मिला। पीड़िता का आरोप है कि थाना प्रभारी ने शिकायत सुनने के बजाय उन्हें डांटकर भगा दिया और साफ शब्दों में कहा —
“तुम्हारा काम नहीं होगा, बार-बार यहां मत आया करो।”
पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी रसूखदार और पैसों वाला व्यक्ति है, जो कथित रूप से अधिकारियों से सांठगांठ कर कार्रवाई रुकवा देता है। रिश्वत और दबाव के चलते अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे पूरा परिवार दहशत और असुरक्षा के साए में जीने को मजबूर है।
आखिरकार न्याय की उम्मीद में पीड़िता ने 11 मई 2026 को जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सूरजपुर को लिखित आवेदन सौंपते हुए निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों के जरिए बेटियों की सुरक्षा और सम्मान के बड़े-बड़े दावे कर रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि एक बेटी को अपने ही घर और रिश्तेदारों से सुरक्षा मांगने के लिए प्रशासनिक दफ्तरों की चौखट पर भटकना पड़ रहा है।

अब बड़ा सवाल यह है कि —

क्या सूरजपुर प्रशासन इस बेटी को इंसाफ दिलाएगा, या उसकी चीखें भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएंगी?

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