कुनकुरी/जशपुर
✍️छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ी अंचल जशपुर में अब कॉफी उत्पादन की संभावनाओं को तलाशने की दिशा में कदम बढ़ने लगा है। जिले की अनुकूल जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, कुनकुरी द्वारा ग्राम ढोढीडांड में कॉफी पौध रोपण एवं एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह पहल क्षेत्र के किसानों के लिए भविष्य में अतिरिक्त और दीर्घकालिक आय का नया जरिया बनने की उम्मीद जगाती है।

डॉ. जानसन लकड़ा के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों के साथ स्थानीय कृषकों ने भी भाग लिया। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY), छत्तीसगढ़ शासन तथा महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, दुर्ग के सहयोग से उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र में वानिकी एवं फलदार वृक्षों पर आधारित कॉफी उत्पादन मॉडल विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रशिक्षण के दौरान महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. दीपक कुमार जायसवाल ने विद्यार्थियों को कॉफी पौधों के वैज्ञानिक रोपण की बारीकियां समझाईं। उन्होंने उपयुक्त स्थल का चयन, गड्ढे की तैयारी, पौधों के बीच उचित दूरी, रोपण की विधि तथा शुरुआती अवस्था में पौधों की देखभाल सहित महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारी दी।
वहीं डॉ. दयासागर, डॉ. नीरज जायसवाल एवं रवि ने कॉफी पौधों में विभिन्न अवस्थाओं के दौरान होने वाले रोग एवं कीट प्रबंधन, पोषक तत्वों की आवश्यकता, पौधों की देखभाल और उत्पादन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की व्यावहारिक जानकारी विद्यार्थियों को दी।
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि विद्यार्थियों ने स्वयं कॉफी के पौधे रोपे और वैज्ञानिक विधि से कॉफी उत्पादन की प्रक्रिया को जमीन पर उतरकर समझा। इससे प्रशिक्षण केवल सैद्धांतिक न रहकर पूरी तरह व्यावहारिक बन गया।
जशपुर का पहाड़ी भू-भाग, प्राकृतिक वातावरण और उपलब्ध संसाधन कॉफी उत्पादन के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल सकते हैं। ऐसे में यह पहल क्षेत्र में कृषि के साथ वानिकी, फलदार वृक्षों और मसाला उत्पादन को जोड़कर किसानों के लिए अतिरिक्त एवं टिकाऊ आय के स्रोत विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
☝️उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र के अधिष्ठाता डॉ. जानसन लकड़ा ने कहा कि कॉफी उत्पादन मॉडल के माध्यम से क्षेत्र की जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ वानिकी एवं फलदार वृक्षों, मसालों के उत्पादन को बढ़ावा देने तथा भविष्य में कॉफी प्रसंस्करण को भी प्रोत्साहित करने की दिशा में काम किया जाएगा।
☝️डॉ. दीपक कुमार जायसवाल ने कहा कि वानिकी आधारित कॉफी मॉडल भविष्य में किसानों को दीर्घकालिक आमदनी के साथ अतिरिक्त आय, स्थानीय रोजगार, मृदा संरक्षण और वन सुरक्षा के क्षेत्र में भी लाभ पहुंचा सकता है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. नीरज जायसवाल ने किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के विद्यार्थी, प्राध्यापक एवं स्थानीय कृषक उपस्थित रहे।
ढोढीडांड में लगाए गए ये कॉफी पौधे फिलहाल छोटे कदम की तरह नजर आ सकते हैं, लेकिन इनके पीछे जशपुर के पहाड़ी अंचल में कृषि की नई दिशा, किसानों की बढ़ती आय और स्थानीय रोजगार की बड़ी संभावना छिपी है। यदि यह मॉडल सफल रहा तो आने वाले समय में जशपुर की पहचान केवल अपनी हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता से ही नहीं, बल्कि यहां की पहाड़ियों में पैदा होने वाली कॉफी से भी बन सकती है।







