आंगनबाड़ी सहायिका भर्ती पर फिर उठे सवाल: दावा-आपत्ति में ‘अपात्र’, फिर महीनों बाद कैसे मिल गई नियुक्ति? ग्रामीणों ने जांच की उठाई मांग..

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सन्ना

✍️महिला एवं बाल विकास विभाग के परियोजना कार्यालय सन्ना में आंगनबाड़ी सहायिका भर्ती को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हासिल करने के आरोप में एक आंगनबाड़ी सहायिका की जांच के बाद सेवा समाप्त किए जाने का मामला सामने आया था। इस कार्रवाई की खबर हल्लाबोल छत्तीसगढ़ न्यूज द्वारा प्रमुखता से जनता के सामने रखी गई थी। अब इस कार्रवाई के बाद उन ग्रामीण अभ्यर्थियों में भी न्याय की उम्मीद जगी है, जिन्हें भर्ती प्रक्रिया के दौरान अपात्र घोषित कर दिया गया था।

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लेकिन अब ग्रामीणों ने परियोजना कार्यालय सन्ना की भर्ती प्रक्रिया पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सीधा है—जिस अभ्यर्थी को दावा-आपत्ति की सूची में चयन समिति ने अपात्र घोषित कर दिया था, वही अभ्यर्थी आखिर महीनों बाद नियुक्ति की पात्र कैसे हो गई?

दावा-आपत्ति में अपात्र, फिर नियुक्ति पत्र कैसे?

ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम पंचायत सन्ना के आश्रित ग्राम गढ़ाकोना में आंगनबाड़ी सहायिका की नियुक्ति को लेकर नियमों की अनदेखी की गई है। उनका कहना है कि जिस अभ्यर्थी को दावा-आपत्ति के लिए जारी सूची में अपात्र घोषित किया गया था, उसी अभ्यर्थी को बाद में नियुक्ति पत्र जारी कर दिया गया।

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ग्रामीण इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए पूछ रहे हैं कि अगर अभ्यर्थी पहले अपात्र थी तो बाद में ऐसा क्या बदला कि वही अभ्यर्थी नियुक्ति की हकदार बन गई?

गढ़ाकोना, लालदारा और देवरापाठ में नियुक्तियों पर भी सवाल

ग्रामीणों के अनुसार पहाड़ी कोरवा बाहुल्य गांव गढ़ाकोना, लालदारा और देवरापाठ स्थित आंगनबाड़ी केंद्रों में जिन अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी किए गए हैं, उनके नाम दावा-आपत्ति के दौरान जारी सूची में अपात्र बताए गए थे।

ग्रामीणों का आरोप है कि इन आंगनबाड़ी केंद्रों के आसपास रहने वाली शिक्षित बालिकाओं ने भी सहायिका पद के लिए आवेदन किया था, लेकिन उन्हें अपात्र घोषित कर दिया गया। वहीं, कथित तौर पर संबंधित आंगनबाड़ी केंद्रों से 5 से 7 किलोमीटर दूर निवास करने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी गई।

स्थानीय अभ्यर्थियों का हक किसने छीना?

ग्रामीणों का कहना है कि आंगनबाड़ी सहायिका भर्ती में स्थानीयता और पात्रता जैसे महत्वपूर्ण मानकों की अनदेखी की गई है। यदि स्थानीय और पात्र अभ्यर्थियों को बाहर कर दूसरे स्थान के अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि क्या भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई? क्या दावा-आपत्ति के दौरान अपात्र घोषित अभ्यर्थियों की दोबारा पात्रता की जांच हुई? अगर हुई तो उसका आधार क्या था? और यदि नियम बदले गए, तो इसकी जानकारी अन्य अभ्यर्थियों को क्यों नहीं दी गई?

अब उच्चस्तरीय जांच की मांग

ग्रामीणों ने जिले के वरिष्ठ अधिकारियों एवं महिला एवं बाल विकास विभाग के उच्चाधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही आरोप सही पाए जाने पर भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी करने वाले जिम्मेदार कर्मचारियों एवं अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है।

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ग्रामीणों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में यदि वास्तव में कोई अनियमितता हुई है तो केवल नियुक्ति रद्द करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जिम्मेदारी तय कर दोषियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।

अब देखना यह है कि सन्ना परियोजना कार्यालय इन गंभीर सवालों का जवाब देता है या फिर जांच की मांग भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाती है।

नोट – यह ख़बर पूर्णत: ग्रामीण क्षैत्रिय चर्चाओं पर आधारित है !

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